फ़िल्म रिव्यू: एयर लिफ्ट

21:06:00 Manjar 0 Comments





आपको शायद वह क्षण याद होगा जब इराक ने तेल के लिए कुवैत पर हमला किया था जिस का नतीजा गल्फ युद्ध था।
1990 में गल्फ वॉर में फंसे एक लाख 70 हजार भारतीयों को सुरक्षित निकलने के लिये इंडियन एयरलांइस  ने 59 दिन तक 500 फ्लाइट्स से दुनिया का सबसे बड़ा एयर रेस्क्यू किया था। भारत सरकार की तब की बड़ी कामयाबी थी।
  भारतीयों को सुरक्षित निकालने के लिए तब के विदेश मंत्री आई. के. गुजराल इराक में सद्दाम हुसैन से मिलने पहुंचे थे। सद्दाम ने सरकार को भारतीयों के रेस्क्यू ऑपरेशन करने की इजाजत दे दी थी।

हालांकि एयरलिफ्ट का रंजीत कोटियाल  महज एक काल्पनिक पात्र हैं। आपको डॉक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म में अंतर तो समझना पड़ेगा। लेकिन एक दो बार इंटरव्यू में अक्षय ओरिजिनल बताएं हैं।

अक्सर इस तरह की फिल्मों में गाथा ऐसे बहादुरों की होती हैं जिसको अब तक गाया गया न हो(अंधीमूल्यित)। राजा कृष्ण मेनन की लाजवाब निर्देशन ने फिल्म को कसी व बांधे रखती हैं। आप चाहकर भी कुर्सी से उठ नही सकते।
इंसान या तो सब के लिये स्थिति से लड़ता हैं या फिर अपना जान विकट परिस्थिति से लड़ते हुए किसी तरह मुसीबत से स्वयं को उससे अलग कर लेता हैं और एक वाक्य में औरों को मुसीबत में छोड़कर खुद भाग जाता हैं। दोनों बातें गलत नही हैं। लेकिन साहसिक बनकर,सबकी परवाह कर,मानवता के मूल्यों को बीच मंझधार में ना छोड़कर । हर सांस तक लड़ जाना,महानता की ये बेजोड़ मिसाल हैं।

रंजीत कोटियाल(अक्षय कुमार) एक सफल और शातिर बिज़नेस मैन हैं। जो खुद को कुवैती मान चुका हैं। 'एयरलिफ्ट' रंजीत कटियाल, उनकी पत्नी अमृता और बच्ची के साथ उन सभी एक लाख सत्तर हजार भारतीयों की कहानी है, जो ईराक-कुवैत युद्ध में  फंस गए हैं। उनके साथ उनका जिंदगी भर की कमाई भी दांव पर लग गया हैं। हर वक़्त स्वयं और अन्य लोगों को जिंदगी की जद्दोजहद से लड़ता देख रंजीत का दिल पिघल जाता हैं। हर वक़्त क्रूर,निर्मोही,अमानवीय और अत्याचार की घटनाओं को महसूस करते रंजीत फैसला करता हैं कि वह अन्य भारतीयों को भी इस मुसीबत से निकाल कर रहेगा।
इसके लिए वह इराक के एक मेजर से बात  करता है, लेकिन वो इतनी बड़ी रकम की मांग करता है, मुश्किल हालात में यह रकम जुटाना मुमकिन नही लगता।
भारत में उसका संपर्क एक अधिकारी से होता है, जो उसकी मदद करना तो चाहता है, लेकिन मंत्रियों का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण अधिकारी मदद करने में असमर्थ हो जाता हैं। थक- हारकर फैसला करता हैं कि वह  बगदाद जायेगा और जाता है ताकि वह वहां उच्चाधिकारियों से बात कर कुवैत से निकलने का कुछ इंतजाम कर सके। बातचीत के बाद उसे संभावना दिखती है। उसे भारत से रसद लेकर कुवैत आ रहा एक पानी के जहाज टीपू सुल्तान में भारतियों को ले जाने की अनुमति मिल जाती है। लेकिन एन वक़्त पर  कुवैत संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप होता है तो टीपू सुल्तान को वापस जाने के लिए कह दिया जाता है।
भारत लौटने के सारे रास्ते जब बंद हो जाते हैं तभी एक रात संजीव कोहली के प्रयास रंग लाते हैं। वो रंजीत को फोन पर कहता है कि वह सभी भारतियों को लेकर ओमान आ जाए, जहां से एयर इंडिया के विमान द्वारा उन्हें एयरलिफ्ट करा लिया जाएगा। रंजीत बखूबी जानता हैं कि यह काम नामुमकिन है, रंजीत बहुत सारे लोगों के साथ ओमान की तरफ निकल जातें हैं। और फिर होता हैं दुनिया का सबसे बड़ा और सफल ऑपरेशन।

एक्शन कुमार, खिलाड़ी कुमार जैसे नामों से मशहूर अभिनेता अक्षय कुमार की  फिल्मों में एक्शन या कॉमेडी न हो तो शायद उनके प्रशंसकों को निराशा हो सकती है। अपने रूटीन फिल्मों से अलग अक्षय कुमार साल में एक दफा जरूर क्लास वाली फिल्में ले आते हैं। स्पेशल 26,हॉलिडे,बेबी और अब एयर लिफ्ट काफी रोमांच पैदा करती हैं। मुझे याद हैं स्पेशल 26 सिर्फ 'मनोज बाजपेयी' के लिए गया था। लेकिन 'अक्षय' ने तब चौकाया था। ऐसा नही हैं कि वे अब उलजलूल और फूहड़ द्विअर्थी वाले फिल्में नही करते। 2 घंटे लम्बी फ़िल्म में कई जगह बोर करती हैं,लेकिन अगले ही पल फिल्म रफ़्तार पकड़ लेती हैं। फिल्म में पैनापन की भी कई जगह कमी दिखी।
निमरत कौर काफी अच्छी लगी हैं। मैं यह कहूँगा यह फिल्म 'देशभक्ति' से ज्यादा 'मानवता बल' पर जोर देती हैं। फिल्म के प्रोमो देखकर लग रहा था कि गानो का क्या काम,लेकिन फिल्म में जरूरत के अनुसार अच्छे लगते हैं। फिल्म में दो जगह विशेषकर बेहद उम्दा हैं जब अक्षय कुमार का ड्राइवर की मौत हो जाती हैं और उसकी पत्नी बिना कहे सब कुछ कह देती हैं। और दूसरे सिन में जब लाखों भारतीय एक छत के नीचे रहते हैं। लेकिन जरा सोंचिये विदेशों में अंधाधुन कमा रहें  भारतीय सिर्फ मुसीबत के समय ही एम्बेसी और सरकार की याद बड़ी सिद्दत से क्यों आती हैं?
हम भले देश को भूल जाये लेकिन देश हमें नही भूलता
सिनेमा घर से बाहर निकलते हुए आप ये गाना आपके जुबां पर चढ़ सकती हैं-
"दिल ले डूबा डूबा मुझको अरेबिक आँखों में
आज लूटा लूटा मुझको फरेबी बातों ने
खामखाँ सा सीने में,प्यार के महीने में
एक ही इशारे पे दिल तुझे दे दी"
"के तेरे लिए दुनिया छोड़ दी हैं
तुझपे ही सांस आके रुके
मैं तुझको कितना चाहता हूँ
यह तु कभी  सोंच ना सके"

निर्माताः भूषण कुमार, अरुणा भाटिया, निखिल आडवाणी
निर्देशकः राजा कृष्ण मेनन
सितारेः अक्षय कुमार, निमरत कौर, फरयान वजीर, इनामुल हक, पूरब कोहली, कुमुद मिश्रा
रेटिंग : ***1/2


0 comments: