कौन हीरो ? कौन जीरो ?

20:19:00 Manjar 0 Comments


शाम के वक़्त हाईस्कूल के प्रांगण में बैठे मेरे मित्र 'अभिषेक' से खेलों के विषय में कुछ ऐसा ही बात कर रहें थे।
ओपी जैशा का नाम हम सब को याद रखनी चाहिए। खिलाड़ी क्यों मेडल नही ला पाये यह समझने के लिये अगर जैशा का किस्सा सुन लिये हो तो आपको समझते देर नही लगेगी। कोई क्रिकेट प्रेमी हो और वह इस खेल से अनभिज्ञ हो तो उन्हें इस लेख से दूर ही रहनी चाहिये। आखिर जान कर वह कर करेंगे भी क्या ? जैशा ओलंपिक में 42 किलोमीटर के मैराथन दौड़ में हिस्सा लेने रियो गई। एथलीटो के ट्रेनिग और उनके जरूरी सुविधा की बात तो करने से रहें, हर बात को देशभक्ति से जोड़ने वाला देश,हॉकी स्टीक लिए बाइक पर स्टंटबाजी करते हुए तिरंगा यात्रा पर निकलने वाला देश, यह देखने जांचने और पूछने की जोहमत नही उठाता कि हमारे एथलीट जरूरी सुविधाएँ लिये रियो जा रहें हैं क्या ? जैशा जब दौड़ने उतरी होगी वह इस बात को लेकर निश्चिंत होगी कि भारतीय अधिकारी उसकी मदद के लिए तैयार बैठे होंगे।
42 किलो मीटर के मैराथन में राष्ट्रीय रिकार्ड होल्डर ओपी जैशा, रियो में फिनिश लाइन पर पहुँचते ही बेहोश हो जाती है और तीन घंटे बाद होश आता है ,सात बोतल ग्लूकोज चढ़ाना पड़ता है। सभी देश लगभग दो-ढाई किमी पर अपने स्टैंड लगाये हुए थे। वे वहाँ पानी, स्पंज और ग्लूकोज बिस्किट, एनर्जी ड्रिंक जैसी चीजें अपने खिलाड़ियों को मुहैया करा रहें थे। जैशा हर दो-ढाई किमी में भारतीय स्टाफ को ढूंढती और वह आगे बढ़ती रहती, वह भारतीय डेस्क को बड़े आशा से निहारती लेकिन वहां केवल झंडा और देश के नाम की तख्ती ही दिखाई देता, न ही कोई सामान और न ही कोई अधिकारी। मजबूरन जैशा को हर आठ किमी पर ओलम्पिक आयोजकों के तरफ से मिलने वाले पानी से ही रेस पूरी करनी पड़ी। जैशा को उस भारतीय डेस्क में उस देश का प्रतिनिधि नही मिला जो राष्ट्रवाद को लेकर हमेशा भावुक रहता है। अफसोस वह इस राष्ट्रवाद से वह ताकत हासिल नही कर सकी जो उसे पदक दिलाये क्योंकि इसके लिये मुकम्मल ट्रेनिंग और सुविधा की जरूरत थी।
जैशा ने इंटरव्यू में कहा कि वह लगभग मर चुकी थी..! पिछले साल बीजिंग में 2 घंटे 34 मिनट का समय लेने वाली जैशा, रियो में 2 घंटे 47 मिनट में फिनिश लाइन तक पहुँचने में सफल  हो गई।

जिस देश में लगभग सतहत्तर सौ करोड़ युवा हों वहाँ भला पदक का अकाल कैसे पड़ गया ? क्योंकि समाज सच जान गया है? कैसा सच ? यही की धर्म खतरे में है,खास धर्म के लोगो की जनंसख्या बड़ रही है और इसतरह चलता रहा तो एक दिन वे लोग बहुसंखयक हो जाएंगे। धर्म बचाओ अभियान पर लाखो रुपये खर्च किये जा रहें हैं। जगह-जगह सेमिनार कर लोगों को चेताया जा रहा हैं। नेता युवाओं से जलूस में नारे लगवा रहें है। युवाओं को नेताओं के भाषण सुन मनमुग्ध है वे भीड़ में ताली पीट कर जबरदस्त जोश दिखा रहें हैं। वहां से मुक्ति मिलते ही तुरंत सोशल मीडिया में आकर ईट से ईट बजा देते हैं। हर समय नेताओं का बचाव करते-करते धन,समय और ऊर्जा का इस्तेमाल करना सीख लिया है।  

ठीक है खेल रत्न मिलनी चाहिये इनाम मे रूपये, जमीन और नौकरियां भी मिलनी चाहिये। लेकिन करोड़ो रुपया सिर्फ एक-दो खिलाड़ी पर लूटा देना। क्या अन्य खिलाड़ियों के बीच असमानता नही पैदा कर देगा? सरकारें और कॉरपोरेट अचानक से इनामों की बारिश कर उस हिस्से को खरीदने कोशिश नही कर रही है जिसे खिलाड़ी ने अपने गौरव में जोड़ा हो । कई और खिलाड़ियों पर ट्रेनिंग के लिए पैसा खर्च किया जाता और उन्हें अच्छी ट्रेनिंग दी जाती तो वह भी आज भारत के लिए पदक लाते। केवल यह दोनों खिलाड़ी ही नहीं, कई और ऐसे खिलाड़ी हैं जो बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं न मिलने की वजह से पीछे रह गए। पुरस्कार से ज्यादा यह जरुरी है कि हर मोर्चे पर संघर्ष कर रहे लाखों खिलाड़ियों के लिए कुछ किया जाय। अभी जो सफलता पर इनाम देकर श्रेय खरीदा जा रहा है वह कुछ हद तक ही सही है।  मैंने ऐसा सुना है किसी को हद से ज्यादा उठा लेने से उसके अंदर से सामूहिकता की भावना नष्ट हो जाता है। सफलता जब व्यक्तिगत रह जाती तब वह कल्याणकारी नही रह जाती। सवा सौं करोड़ वाले जनसंख्या में ओलंपिक में दो मेडल गर्व इसलिये करते है क्योंकि यहां लगभग हर खेल का हेड खिलाड़ी ना होकर राजनेता बन जाता है जो बेहद सटीक खेलनिति का मुज़ाहिरा विश्व मंच पर करता है। बाकि ट्रेनिंग, सुविधा, आधारभूत संरचना का विकास बेईमानी वाली बात होगी।
ख्याल रहें केवल जैशा ही अकेली न थी अभी जो दीपा को खेल पुरस्कार मिला है उसे भी क्वार्टरफाइनल में फ़िजियो मिला।
खेल मंत्री जी का सेल्फ़ी मुझे काफी आकर्षक लगा, पता नही क्यों नेताजी को ओलंपिक वालों से डांट सुनना पड़ा।

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