फिल्म रिव्यू: फैन



सितारे : शाहरुख खान, वलुशा डिसूजा, श्रेया पिल्गावकर
निर्देशक : मनीष शर्मा
निर्माता : आदित्य चोपड़ा/यशराज फिल्म्स
संगीत : विशाल-शेखर
गीत : वरुण ग्रोवर
लेखक : हबीब फैजल
रेटिंग : 4 स्टार (****)

कैसा महसूस होता जब आपका फेवरेट स्टार अपना सिग्नेचर स्टाइल कर रहा होता हैं तो ?
वह चहरे पर सनसनाहट,उत्तेजना,संवेदना पैदा कर देती हैं। शरीर में अचानक से बिजली सी चमक,स्फूर्ति आ जाती हैं।
यह किसी के संग हो न हो शाहरुख के फैन्स के साथ जरूर होता हैं।
शाहरुख जब अपना बाँह फैला रहे होते तो ऐसा ही होता है।
कनेक्शन भी कमाल की चीज़ हैं,बस हो गया तो हो गया।
अपने चहेते स्टार को जब आप टीवी, फिल्मों और इंटरव्यूओं में देख रहें होते है तो  ऐसा लगता हैं कि आप उसके करीब हो उससे बातें कर रहें हो। उसके संवेदना से आप भी चल रहें होते हैं। बिल्कुल दोस्त की तरह,ऐसा लगता हैं अब उठके आप अपने सुख दुःख सब बयान कर देंगे। लेकिन यदि सामने मिल जाएं तो जिंदगी भर की यादें कुछ मिंटो में बतलाने की कोशिस करेंगे। यदि अपने आप को सबसे बड़ा फैन बतलाने वाला वो जो 25 साल तक दीवानगी दिखाया हो सिर्फ अपने स्टार से 5 मिनट मांगता हैं।
लेकिन जवाब मिलता हैं-मेरी लाइफ हैं, मैं तुम्हें 5 सेकेंड भी क्यों दु ?

यह कहानी है दिल्ली में रहने वाले एक युवक गौरव चान्ना की।
गौरव अपने आप को आर्यन खन्ना का सबसे बड़ा  फ़ैन बतलाता है। लोग उसे जूनियर आर्यन खन्ना के नाम से बुलाते हैं। गौरव, आर्यन की तरह कुछ-कुछ दिखता है, लेकिन उसका नकल कमाल का उतारता है, उसकी तरह बोल भी सकता है और इसी कारण वह अपने इलाके में एक प्रतियोगिता जीतता है। इनाम में जीती हुई ट्रॉफ़ी वह आर्यन को देना चाहता है जिसके लिए वह मुंबई पहुंच जाता है।

गौरव, आर्यन से उसके जन्मदिन पर मिलने उसके घर मुंबई जाता है । लेकिन हाथ लगती है सिर्फ निराश,दुःख,घृणा और बहुत सारी नफरत भरी यादें । हजारों प्रशंसकों की भीड़ में  गौरव खो जाता हैं। तय करता हैं कि आर्यन से मिल के ही जायेगा भले ही इसकी कीमत कितनी भी बड़ी क्यों न हो। इसी कारण आर्यन, गौरव की खातिर कुछ करता हैं। लेकिन कुछ ऐसा कर देता हैं की आर्यन, गौरव को पुलिस के हवाले कर देता है और बस यहीं से गौरव, आर्यन का दुश्मन बन जाता है। और वह चाहता हैं कि आर्यन उससे माफी मांग ले। इस चक्कर में वह सारी हदें तोड़ देता हैं और अंत में उसकी बीवी-बच्चों तक पहुंच जाता हैं। फिर क्या होता हैं? कैसे होता हैं ? यह देखने में बहुत रोमांचकारी लगता हैं।


एक्टिंग: शाहरुख खान ने इस फिल्म के जरिये फिर से साबित किया हैं कि आखिर वे बॉलीवुड के किंग क्यों हैं। गौरव के किरदार को अभिनय से जीवंत और  यादगार बना दिया हैं। डॉयलॉग डिलवरी बिल्कुल परफेक्ट रही हैं। शाहरुख इस फिल्म के हर फ्रेम में हैं और हर फ्रेम में एक्टिंग काबिले तारीफ हैं। शाहरूख ने इस फिल्म में अपने अदाकारी से अलग आयाम तक पहुंचा दिया हैं। शाहरुख ने अपने दोनों किरदारों के बीच कमाल का अंतर रखा है,चाल-ढ़ाल बोली सब के सब अलग-अलग लगते हैं।
शाहरुख,गौरव के किरदार में जब पहली बार आर्यन को उनके जन्मदिन के मौके पर देखता हैं। और उनका नाम लेकर आंखो में चमक,चेहरे पर खुशी और होंठो पर मुस्कान लिए जिस अंदाज से शाहरुख को देखता हैं और चिल्लाता हैं वह कमाल का। सिर्फ इस सीन को देखकर आप के पूरे पैसे वसूल हो जाते हैं। मैं सिर्फ इस सीन के लिए पूरे 1000 स्टार कुर्बान कर दूंगा।

निर्देशनडायरेक्टर मनीष शर्मा ने अपने डायरेक्शन में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म इंटरवल के बाद थोड़ी धीमी लगती है वह इसलिए क्योंकि क्लाइमेक्स तक रफ़्तार पकड़ना होता हैं। जैसे फिल्म की कहानी की स्पीड धीमी होती हैं,फिल्म को पिक पॉइंट तक लाने के लिए मनीष शर्मा ने तुरंत उसमें गति दे देते हैं। जिसमें फिल्म की पटकथा, पेस और निर्देशन का तालमेल अद्भुत हैं और अंत तक इसे बचा लेती हैं। 
फिल्म देखते समय आप सोच में पड़ जाते हैं कि आपकी भावनाएं किसके संग हैं, फैन या स्टार के संग लेकिन फ़िल्म के अंत तक आप तय नही कर पाते और दोनों किरदारों के बीच बंट जाते हैं। यही जीत है कहानी और निर्देशन की।

फिल्म: कुल मिला कर एक बहुत ही अच्छी फिल्म बनी है। परिवार के साथ देख सकते हैं। यह फिल्म अन्य बॉलीवुड फिल्मों से अलग है। शाहरुख के फैन न भी हो तब भी जाये। जाइए सिनेमाघरों में एक बेहतरीन फिल्म आपका इंतजार कर रही है। इस फिल्म में बॉलीवुडिया स्टाइल में जबरन गाने नही ठुसे गए हैं। फिल्म में एक्शन सीन और जज़्बातों का उतार चढ़ाव शानदार हैं। इस फिल्म का एक अंतिम संवाद, जिसमें गौरव कहता है... तूने सबकुछ बोल दिया, लेकिन सॉरी नहीं बोला... आर्यन बस उसे देखता रह जाता है... फिर गौरव कहता है तू नहीं समझेगा...


बूंद-बूंद पानी को तरसे लोग



भारतीयों का मूल स्वभाव हैं,हम सब विषय पर बात कर लेंगे। गाय-भैंस हिन्दू मुस्लिम मंदिर मस्जिद हिन्दुस्तान पाकिस्तान धर्म रक्षा देशद्रोही भारत माता की जय ये सभी अहम मुद्दों पर सोशल साइट पर कई दिन तक चर्चा होती रहेगी। फ़र्जी राष्ट्रवादी एंकर वीडियो एडिट करने में कोई कसर नही छोड़ेगा।
और यहाँ देश की हालात बिगड़ती जा रही हैं। 5 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सूखे की हालात बेहद गंभीर हैं। आंकलन से पता चलता हैं स्थिति नियंत्रण से बाहर हैं। सिंचाई की बात करना अभी हास्यपद होगा। मसला अभी पीने के पानी पर ही अटका हैं। मात्र 5 लीटर पानी के सहारे एक-एक महीना बिताना पड़ रहा हैं। यह नज़ारा हैं बीड़ के हेलम गांव का जहाँ 1 घड़ा पानी भरने में 5-6 घण्टा टाइम लग जा रहा हैं। लोग पहले तो गांव से निकलकर 2 किलोमीटर दूर एक लगभग सूखा हुआ कुआं तक जाते हैं। फिर वहां अपनी बारी का इंतजार करते हैं। और अंत में 60 फिट गहरे कुआं में उतरते हैं और 2 से 3 घण्टा पानी भरने में बहुत संयम और धीरज की आवश्यकता पड़ती हैं। पानी चट्टानों से रिसते हुए धीरे-धीरे बाहर आता हैं। ये वो पानी होते हैं जो जान बचाने के लिए उपयोग होता हैं,जो शुद्धता के पैमाना को पहले ही ध्वस्त कर चुका होता हैं। कही-कही तो 250 फिट तक जमीन के अंदर पानी नही मिल रहा हैं। मोहल्ले मे टैंकरों को देखते ही लोग दौड़ पड़ते हैं। पानी को लेकर झगड़े होने लगे हैं। सोंचिये जरा आपको ऑफिस जाना हो तो कितने दिन बिना नहाये परफ्यूम के भरोसे चले जाएंगे? अंदाजन 20-30 दिन। हालात बिल्कुल ऐसा ही हैं।

केंद्रीय जल आयोग बता रहा था कि 91 प्रमुख जलाशयों में केवल 29 फीसदी पानी बचा है। यह भयावह की स्थिति हैं । यह इस दशक में पानी का सबसे निचला स्तर है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में हजारों गांव पानी के लिए पूरी तरह सरकारी टैंकरों पर निर्भर हैं। लातूर में हर सप्ताह केवल तीन दिन पानी बांटा जाता है। रविवार को जब पानी एक्सप्रेस राजस्थान के कोटा वर्कशॉप से पुणे के मिरज पहुंची तो स्थानीय नेताओं ने फूल माला चढ़ाकर स्वागत किया। फिर मिराज से पानी लेकर रवाना हुई । इस ट्रेन में पांच लाख 40 हज़ार लीटर पानी है। मंगलवार सुबह साढ़े पांच बजे जब यह रेलवे स्टेशन पहुंची तो उसका स्वागत करने के लिए वहां क़रीब डेढ़ सौ लोग मौजूद थे।
ट्रेन के पहुंचने के बाद लोग अपने अपने मोबाइल फ़ोन से तस्वीरें खींचने लगे। लोगों ने गाड़ी के ड्राइवर, गार्ड और रेलवे पुलिस के कर्मियों का स्वागत किया ।

आखिर इसे संकट बनाने में हमारा तो योगदान खूब रहा ही हैं। जरूर 2-3 कमजोर मॉनसून इसकी प्रमुख वजह रही। इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं? इन क्षेत्रों में जायजा लेने से साफ पता चलता हैं कि बारिश बुलाने वाले पेड़ अब रहें ही नही। तेज शहरीकरण ने पेड़ो की अंधाधुन कटाई को बर्दाश्त कर लिया। सरकार की नीति तब भी और अब भी अभूतपूर्व हैं। सूखे से निपटने के लिए कोई ठोस कदम बनाने की जरूरत नही हैं। किस-किस संख्या के बारे में बात करूँ वह जो तलाब-नहरों के लिए आवंटित करोड़ो रुपये के बारे में या फिर उस पाइपलाइन के बारे जिसका राह देखते-देखते कंठ सूख  गए। हम पहले से ही हिन्दू-मुस्लिम देशभक्त-देशद्रोही में खुश हैं। क्या आपने कभी नेताओं से रोटी-पानी-रोजगार के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की हैं?क्या आपने मूल-भुत सुविधाएं पर नेताओं से सवाल पूछते जनता को देखा हैं ? अनाज तो पैदा होने से रहा। इंसान के साथ-साथ जानवर भी बीमार पड़ रहे हैं। हम-आप ही इन नेताओं को इतनी छूट दे रखे हैं की इन सब सवालों का सामना उन्हें नही करना पड़ता हैं। इस सरकार की कमी ही रही हैं कि कोई काम की बात नही करता। कोई कहता हैं सिर काट देंगे। कोई कहता हैं जबान खींच लेंगे। तो कोई देश से बाहर भेजने की बात करता हैं। हर समस्या को साथ-मिलकर समाधान निकाल लिया जाता। लेकिन राष्ट्र को ही इन मुद्दों से भटका दिया जाता हैं। क्या इस तरह हम श्रेष्ट राष्ट्र के तौर पर उभर पाएंगे? जब एकता ही न हो।
कहिये भारत माता की जय।
सब समस्या का समाधान हो जायेगा।


व्यक्ति विशेष: स्टीव जॉब्स



व्यक्ति विशेष : स्टीव जॉब्स
पूरा नाम    –  स्टीवन पॉल जॉब्स.
जन्म         –  24 फ़रवरी 1955.
मृत्यु           -  अक्टूबर 5, 2011 (उम्र 56)
पालो आल्टो, कैलिफ़ोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका
जन्मस्थान – सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमरीका.
पिता          – पॉल रेनहोल्ड जॉब्स
माता         – क्लारा जॉब्स
विवाह       –  लोरेन पॉवेल
बच्चें         – लिसा ब्रेनन जॉब्स, आयलैंड सिएना जॉब्स, ईव जॉब्स, रीड जॉब्स
व्यवसाय    - को-फ़ाउंडर, चेरमन और           सी॰ई॰ओ॰, एप्पल इंक°, पिक्सार (Pixar), को-फ़ाउंडर और सी॰ई॰ओ॰, नेक्स्ट इंक॰
पुरस्कार     -1972 में टाइम मैगज़ीन ने उनके द्वारा बनाये गये एप्पल कम्प्यूटर को मशीन आफ दि इयर का खिताब दिया।
2007 मे फार्चून मैगज़ीन ने उन्हे उद्योग मे सबसे शक्तिशाली पुरुष का खिताब दिया। उसी साल मे उन्हे 'कैलिफोर्निया हाल आफ फेम' का पुरस्कार मे उन्हे 1984 में अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा नेशनल मेडल आफ टेक्नोलॉजी प्राप्त हुआ। 2010 फोर्ब्स पत्रिका के पर्सन ऑफ दि इयर चुने गए। 2011 को बुडापेस्ट में ग्राफिसाफ्ट कंपनी ने उन्हे आधुनिक युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक चुनकर, स्टीव जॉब्स को दुनिया का पहला कांस्य प्रतिमा भेंट किया।जॉन कार्टर और ब्रेव नामक दो फिल्मे जाब्स को समर्पित की गयी। उनकी आत्मकथा  ‘आईस्टीव: दी बुक आफ जॉब्स’ काफी चर्चित रही।

एप्पल कम्प्यूटर और पिक्सर एनिमेशन के सीईओ स्टीव जॉब्स ने हमेशा अपने दिल की बात सुनी और दुनिया में  जो मुकाम हासिल किया,जिसके बदौलत वे पूरे सदी भर लोगो को प्रेरणा देते रहेंगे।
जॉब्स 1970 में हुई माइक्रो कंप्यूटर की क्रांति के जनक है। उन्होंने अपने सहकर्मी स्टीव वोज्निक के साथ मिलकर एप्पल की स्थापना की ।
वे पिक्सर के संस्थापक, सभापति, और साथ ही नेक्स्ट इनकारपोरेशन के सीईओ भी थे। डिज्नी ने पिक्सर का अधिग्रहण कर लिया जिसके बाद वे द वाल्ट डिज्नी कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर बने।
जॉब्स 1976 में एप्पल के सह-संस्थापक बने और एप्पल के पर्सनल कंप्यूटर बेचने लगे। जॉब्स ने रचनात्मक पर विशेष ध्यान दिया जिसके बदौलत एप्पल तेज़ी से आगे बढती गयी और पहले साल के अंत में ही पर्सनल कंप्यूटर बनाने वाली दूसरी कंपनी बन गयी।  एप्पल इतनी बड़ी मात्र में पर्सनल कंप्यूटर का उत्पादन करने वाली पहले सबसे बड़ी कंपनी बनी। 1979 में, Xerox PARC के टूर के बाद, जॉब्स ने Xerox Alto की व्यावहारिक जरूरतों को जाना, परखा, जिसने बाद में माउस का निर्माण किया और साथ ही ग्राफिकल यूजर इंटरफ़ेस (GUI) का भी निर्माण किया।
GUI को कंप्यूटर के उत्पादन में इस्तेमाल की चाह ने 1985 में एप्पल लेसनर प्रिंटर प्रस्तुत किया।
यह अतिरिक्त रंग को सपोर्ट करने वाला सिस्टम था। अपने कार्यो से निवेशकों को प्रभावित करने में सफल रहें। जिससे तेजी से निवेश आयें और कम्पनी का आय बढ़ता चला गया। वे एनीमेशन मूवी का निर्माण में भी कदम रखें, 1995 में आई फिल्म टॉय स्टोरी में उन्होंने बतौर कार्यकर्त्ता और निर्माता काम किया।
एप्पल से इस्तीफ़ा देने के बाद, स्टीव ने 1975 मे नेक्स्ट इंक की स्थापना की। नेक्स्ट कार्य केंद्र अपनी तकनीकी ताकत के लिए जाना जाता था, उनके उद्देश्य उन्मुख सॉफ्टवेयर विकास प्रणाली बनाना था।
1996 मे एप्पल की बाजार में हालत बिगड़ गई तब स्टीव, नेक्स्ट कम्प्यूटर को एप्पल को बेचने के बाद वे एप्पल के चीफ एक्जिक्यूटिव आफिसर बन गये। एप्पल से जुड़ने के बाद 1997 में एक नयी सोच के साथ कंप्यूटर का उत्पादन करना शुरू किया जिसे “Think Different" का नाम दिया। इसमें यह बात छुपी थी की जीवन में यदि हमें सफल होना है तो किसी का भी इंतज़ार किये बिना ही अकेले चलना सीखना होगा।
"Stay Hungry Stay Foolish"

सन् 1998 से उन्होंने कंपनी में बतौर सीईओ काम किया 1998 मे आइमैक बाजार में आया जो बड़ा ही आकर्षक तथा अल्प पारदर्शी खोल वाला पीसी था।
उन्होंने एप्पल के कई प्रोडक्ट्स जैसे iMac, iTunes, Apple Stores, iPod, iTunes Store, iPhone, App Store और iPad का निर्माण किया।  उनके नेतृत्व में एप्पल ने बड़ी सफलता प्राप्त की।
2003 में उन्हें पैनक्रियाटिक कैंसर की बीमारी हुई।
जिसके कारण जॉब्स को 5 अक्टूबर 2011 को इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ा।
12 जून 2005 को स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक प्रोग्राम में शामिल हुए जहाँ उन्होंने अपने जीवन का सबसे प्रसिद्ध भाषण “Stay Hunger Stay Foolish” दिया। इस स्पीच में उन्होंने अपने जीवन से जुडी कहानियां सुनाई थी। आपके लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहे है वह भाषण:

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक में आपके साथ होने पर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ. मैंने कॉलेज की पढ़ाई कभी पूरी नहीं की. और यह बात कॉलेज की ग्रेजुएशन संबंधी पढ़ाई को लेकर सबसे सच्ची बात है. आज मैं आपको अपने जीवन की तीन कहानियाँ सुनाना चाहता हूँ. कोई बड़ी बात नहीं, केवल तीन कहानियां.

इनमें से पहली कहानी शुरुआत होती है. रीड कॉलेज में आरंभिक छह महीनों के बाद ही मैं बाहर आ गया था. करीब 18 और महीनों तक मैं इसमें किसी तरह बना रहा लेकिन बाद में वास्तव में मैंने पढ़ाई छोड़ दी. पैदा होने से पहले ही मेरी पढ़ाई की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं. मेरी जन्मदात्री माँ एक युवा, अविवाहित कॉलेज ग्रेजुएट छात्रा थीं और उन्होंने मुझे किसी को गोद देने का फैसला किया.

वे बड़ी शिद्दत से महसूस करती थीं कि मुझे गोद लेने वाले कॉलेज ग्रेजुएट हों, इसलिए जन्म से पहले ही तय हो गया था कि एक वकील और उनकी पत्नी मुझे गोद लेंगे. पर जब मैं पैदा हो गया तो उन्होंने महसूस किया था कि वे एक लड़की चाहते थे, इसलिए उसके बाद प्रतीक्षारत मेरे माता-पिता को आधी रात को फोन पहुँचा.

उनसे पूछा गया कि हमारे पास एक लड़का है, क्या वे उसे गोद लेना चाहेंगे? उन्होंने जवाब दिया – ‘हाँ.’ मेरी जैविक माता को जब पता चला कि वे जिस माँ को मुझे गोद देने जा रही थीं, उन्होंने कभी कॉलेज की पढ़ाई नहीं की है और मेरे भावी पिता हाई स्कूल पास भी नहीं थे, तो उन्होंने गोद देने के कागजों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और वे इसके कुछ महीनों बात वे तभी इस बात के लिये तैयार हुईं कि जब मेरे माता-पिता ने उनसे वायदा किया कि वे एक दिन मुझे कॉलेज पढ़ने के लिए भेजेंगे.

सत्रह वर्षों बाद मैं कॉलेज पढ़ने गया लेकिन जानबूझकर ऐसा महंगा कॉलेज चुना जो कि स्टानफोर्ड जैसा ही महंगा था और मेरे कामगार श्रेणी के माता-पिता की सारी बचत कॉलेज की ट्यूशन फीस पर खर्च होने लगी.

छह महीने बाद मुझे लगने लगा कि इसकी कोई कीमत नहीं है पर मुझे यह भी पता नहीं था कि मुझे जिंदगी में करना क्या था और इस बात का तो और भी पता नहीं था कि इससे कॉलेज की पढ़ाई में कैसे मदद मिलेगी लेकिन मैंने अपने माता-पिता के जीवन की सारी कमाई को खर्च कर दिया था. इसलिए मैंने कॉलेज छोड़ने का फैसला किया और भरोसा रखा कि इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.

हालांकि शुरू में यह विचार डरावना था लेकिन बाद में यह मेरे सबसे अच्छे फैसलों में से एक रहा. कॉलेज छोड़ने के बाद मैंने उन कक्षाओं में प्रवेश लेना शुरू किया जो कि मनोरंजक लगते थे.

उस समय मेरे पास सोने का कमरा भी नहीं था, इसलिए मैं अपने दोस्तों के कमरों के फर्श पर सोया करता था. कोक की बोतलें इकट्ठा कर खाने का इंतजाम करता और हरे कृष्ण मंदिर में अच्छा खाना खाने के लिए प्रत्येक रविवार की रात सात मील पैदल चलकर जाता. पर बाद में अपनी उत्सुकता और पूर्वाभास को मैंने अमूल्य पाया.

उस समय रीड कॉलेज में देश में कैलीग्राफी की सबसे अच्छी शिक्षा दी जाती थी. इस कॉलेज के परिसर में लगे पोस्टर, प्रत्येक ड्रावर पर लगा लेवल खूबसूरती से कैलीग्राफ्ड होता था. चूंकि मैं पहले ही कॉलेज की पढ़ाई छोड़ चुका था और अन्य कक्षाओं में मुझे जाना नहीं था, इसलिए मैंने कैलिग्राफी कक्षा में प्रवेश ले लिया.

यहाँ रहते हुए मैंने विभिन्न टाइपफेसों की बारीकियाँ जानी और महसूस किया कि यह किसी भी साइंस की तुलना में अधिक सुंदर और आकर्षक हैं. हालांकि इन बातों के मेरे जीवन में किसी तरह के व्यवहारिक उपयोग की कोई संभावना नहीं थी. लेकिन दस वर्षों के बाद मैकिंतोश के पहले कम्प्यूटर को डिजाइन करते समय हमने अपना सारा ज्ञान इसमें उड़ेल दिया. यह पहला कम्प्यूटर था, जिसमें सुंदर टाइपोग्राफी थी.
अगर मैंने इस कोर्स को नहीं किया होता तो मैक का मल्टीपल टाइपफेस इतना सुंदर नहीं होता. और चूँकि विडोंज ने मैक की नकल की, इसलिए यही संभावना थी कि किसी भी पर्सनल कम्प्यूटर में यह बात नहीं होती. अगर मैंने कॉलेज नहीं छोड़ा होता तो कैलिग्राफी क्लास में नहीं गया होता और पर्सनल कम्प्यूटरों में उतनी सुंदर टाइपोग्राफी नहीं होती, जितनी है.

जब मैं कॉलेज में था तो जीवन में आगे बढ़ने की ऐसी किसी संभावना को नहीं देख पाता लेकिन दस साल बाद बिलकुल स्पष्ट दिखाई देती थी. आम तौर पर आप भविष्य में पूर्वानुमान लगाकर आगे नहीं बढ़ सकते हैं और आप इस तरह के कदमों को अतीत से ही जोड़कर देख सकते हैं.

इसलिए आपको भरोसा रखना होगा कि ये संकेत आपको भविष्य में मददगार साबित होंगे. इन्हें आप साहस, भाग्य, जीवन, कर्म या कोई भी नाम दें लेकिन मेरे जीवन में इस प्रयोग ने कभी निराश नहीं किया और इससे मेरे जीवन में सभी महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं.

मेरी दूसरी कहानी प्यार और पराजय के बारे में है. मैं भाग्यशाली था कि जीवन में मुझे जो कुछ करना था, उसकी जानकारी मुझे काफी पहले मिल गई थी. वोज और मैंने एप्पल को अपने माता-पिता के गैराज में शुरू किया था और तब मैं 20 वर्ष का था.

कड़ी मेहनत से दस वर्षों में एप्पल मात्र दो लोगों की कंपनी से 2 अरब डॉलर की 4 हजार कर्मचारियों से अधिक की कंपनी बन गई. तब हमने अपना सबसे अच्छा उत्पाद 'मैकिंतोश' जारी किया था. उस समय एक वर्ष पहले मैंने 30वीं सालगिरह मनाई थी. और इसके बाद ही मुझे कंपनी से निकाल दिया गया.

जब कंपनी आपने ही शुरू की हो तो कैसे आपको इससे निकाला जा सकता है. जैसे-जैसे एप्पल बढ़ती गई, मैंने अपने से ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति को कंपनी चलाने के लिए रखा. एक साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन बाद में भविष्य की योजनाओं को लेकर मतभेद होते गए और अंत में झगड़ा हो गया.

हमारे झगड़े के बाद बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने उसका पक्ष लिया और तीस वर्ष की आयु में कंपनी से बाहर हो गया. अपने वयस्क जीवन में मैंने जिस पर अपना सब कुछ लगा दिया था, वह जा चुका था और यह बहुत निराशाजनक बात थी.

इसके बाद कुछे महीनों तक तो मुझे नहीं सूझा कि क्या करूँ. मुझे लगा कि मैंने पहली पीढ़ी के उद्यमियों को निराश किया और जब बैटन मेरे हाथ में आने वाला था, तब मैंने इसे गिरा दिया.

मैं डेविड पैकर्ड और बॉब नॉयस से मिला और उनसे अपने व्यवहार के लिए माफी माँगने का प्रयास किया और इस समय मैंने कैलिफोर्निया से ही भागने का मन बनाया लेकिन धीरे-धीरे कुछ बात मेरी समझ में आने लगी और मुझे वही सब कुछ अच्छा लगने लगा था, जो कि कभी अच्छा नहीं लगता था. हालाँकि इस बीच एप्पल में थोड़ा बहुत भी बदलाव नहीं आया था, इसलिए मैंने सब कुछ नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया.

उस समय यह बात मेरी समझ में नहीं आई लेकिन बाद में लगा कि एप्पल से हटा दिया जाना, ऐसी सबसे अच्छी बात थी जो कि मेरे लिए कभी हो सकती थी. सफल होने का बोझ फिर से खाली होने के भाव से भर गया और मैंने जीवन के सबसे अधिक रचनात्मक दौर में प्रवेश किया.

अगले पाँच वर्षों के दौरान मैंने कंपनी नेक्सट और पिक्सर शुरू की और मुझे एक सुंदर महिला से प्यार हुआ जो कि मेरी पत्नी बनी. पिक्सर ने दुनिया की सबसे पहली कम्प्यूटर एनीमेटेड फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनाई और अब यह दुनिया का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है.

एक असाधारण घटना के तहत एप्पल ने नेक्सट को खरीद लिया और मैं फिर एप्पल में वापस आ गया. हमने नेक्सट में जो तकनीक विकसित की, वह एप्पल के वर्तमान पुनर्जीवन की आधारशिला है. इसी के साथ ही लॉरीन और मेरा परिवार भी बढ़ा.

यह बात मैं सुनिश्चित तौर पर मानता हूँ कि अगर मुझे एप्पल से हटाया नहीं जाता तो ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा होता. यह एक स्वाद में बुरी दवा थी लेकिन मरीज को इसकी सख्त जरूरत थी. कभी-कभी आपको जीवन में ठोकरें भी खानी पड़ती हैं लेकिन हिम्मत ना हारें.

मुझे विश्वास है कि जिस चीज ने मुझे लगातार क्रियाशील बनाए रखा था, वह अपने काम के प्रति मेरा प्यार था. आपको जीवन में यह पता लगाना होता है कि आप किस काम से प्यार करते हैं. यह बात काम को लेकर भी उतनी ही सच है, जितनी कि जीवन में प्रेमी-प्रेमिकाओं को लेकर होती है.
आपका काम एक ऐसी चीज है जो कि आपके जीवन के एक बड़े खाली हिस्से को भरता है. महान काम करने की एकमात्र शर्त यही है कि आप अपने काम से प्यार करें. अगर आपको इसका पता नहीं है तो पता लगाते रहिए. दिल के सारे मामलों में आपको पता लगेगा कि यह आपको कब मिलेगा. जैसे-जैसे समय निकलता जाता है इसके साथ आपका रिश्ता बेहतर होता चला जाता है, इसलिए रुकें नहीं इसकी खोज करते रहें.

मेरी तीसरी कहानी मौत के बारे में है. जब मैं सत्रह वर्ष का था, तब मैंने एक कथन पढ़ा था जो कुछ इस प्रकार था- 'अगर आप अपने जीवन के प्रत्येक दिन को अंतिम दिन मानकर जीते हैं तो किसी दिन आप निश्चित तौर पर सही सिद्ध होंगे.'

इसका मुझ पर असर पड़ा और जीवन के पिछले 33 वर्षों में मैंने प्रत्येक दिन शीशे में अपने आप को देखा और अपने आप से पूछा कि 'अगर यह जीवन का आखिरी दिन हो, क्या मैं वह सब करूँगा जो कि मुझे आज करना है. और जब कई दिनों तक इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक रहा तो मुझे पता लगा कि मुझे कुछ बदलने की जरूरत है.'

मैंने अपने जीवन के सबसे बड़े फैसलों को करते समय, मैंने अपनी मौत के विचार को सबसे महत्वपूर्ण औजार बनाया क्योंकि मौत के सामने सभी बाहरी प्रत्याशाएं, सारा घमंड, असफलता या व्याकुलता का डर समाप्त हो जाता है और जो कुछ वास्तविक रूप से महत्वपूर्ण है, बचा रह जाता है.

मैं सोचता हूँ कि जब आप याद रखते हैं कि आप मरने वाले हैं तो आपका सारा भय समाप्त हो जाता है कि आप कुछ खोने वाले हैं. जब पहले से ही आपके पास कुछ नहीं है तो क्यों ना अपने दिल की बात मानें.

करीब एक वर्ष पहले मेरा कैंसर का इलाज हुआ. सुबह साढ़े सात बजे स्कैन किया गया और इसमें स्पष्ट रूप से पता लगा कि मेरे पैंक्रीएस में एक ट्यूमर है. मुझे पता नहीं था कि पैंक्रीएस कैसा होता है.

डॉक्टरों ने मुझे बताया कि यह एक प्रकार का कैंसर है, जो कि असाध्य है और मैं तीन से छह माह तक ही जीवित रहूँगा. मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं अपने अधूरे कामकाज निपटाऊँ. डॉक्टर ने कहा कि अपने बच्चों को जो आप दस साल में बताने वाले हैं, उन बातों को कुछेक महीनों में बताएँ. इसका अर्थ है कि पहले से तैयार हो जाएँ ताकि आपके परिवार के लिए सभी कुछ सहज रहे. इसका अर्थ है कि आप अंतिम विदा लेने की तैयारी कर लें.

पर डॉक्टरों ने अपने परीक्षणों में पाया कि मैं ऐसे कैंसर से पीड़ित हूँ जो कि ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है. मेरा ऑपरेशन किया गया और अब मैं पूरी तरह से ठीक हूँ. यह मौत के सबसे करीब होने का अनुभव था और मैं उम्मीद करता हूँ कि इस अनुभव के बाद मैं कुछेक दशक तक और जी सकता हूँ.

मैं आपसे कह सकता हूँ कि जब मौत उपयोगी हो, तब इसके करीब होने का विचार पूरी तरह से एक बौद्धिक विचार है. मरना कोई नहीं चाहता. जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, वे भी मरना नहीं चाहते लेकिन यह ऐसा गंतव्य है, जहाँ हम सबको पहुँचना ही है. कोई भी इससे नहीं बचा है और इसे जीवन की सबसे अच्छी खोज होना चाहिए. जीवन बदलाव का कारक है और पुराने के स्थान पर नया स्थान लेता है. आप लोग भी बूढ़े होंगे और इसके बाद की स्थिति से भी गुजरेंगे.

आपका समय सीमित है, इसलिए इसे ऐसे नहीं जिएं जैसे कि किसी और का जीवन जी रहे हों. दूसरे लोगों की सोच के परिणामों से प्रभावित न हों और दूसरों के विचारों के बजाए अपने विचारों को महत्व दें. और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप अपने दिल की बात सुनें. आपके दिलो दिमाग को पहले से ही अच्छी तरह पता है कि आप वास्तव में क्या बनना चाहते हैं.

जब मैं युवा था तब एक आश्चर्यजनक प्रकाशन 'द होल अर्थ कैटलॉग' बिकता था, जो कि मेरी पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण किताब थी. इसे मेनलो पार्क में रहने वाले व्यक्ति स्टुअर्ट ब्रांड ने प्रकाशित किया था. यह साठ के दशक के अंतिम वर्षों की बात थी और तब पर्सनल कम्प्यूटर और डेस्कटॉप प्रकाशन नहीं थे लेकिन तब भी यह गूगल का पैपरबैक संस्करण था.

स्टुअर्ट और उसकी टीम ने इस किताब के कई संस्करण निकाले और जब इसका समय पूरा हो गया तो इसने अंतिम संस्करण निकाला. सत्तर के दशक के मध्य में यह अंक निकाला गया था और तब मैं आपकी आयु का था.

इस पुस्तक के अंतिम पन्ने पर सुबह की एक तस्वीर थी, जिसमें ग्रामीण इलाका दर्शाया गया था. इस तस्वीर के नीचे शब्द लिखे थे 'स्टे हंग्री, स्टे फुलिश.'